धान में बड़ी हेराफेरी संग्रहण केंद्रों में प्रति बोरा 37 किलो वजन…
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.समिति प्रबंधकों से भी वसूला शॉर्टेज, संग्रहण केंद्रों के धान में सूखत के नाम पर लाखों रुपए की अवैध कमाई..
रायगढ़। रायगढ़ के दोनों संग्रहण केंद्रों में धान का एक नया खेल सामने आया है। बहुत ही शातिर तरीके से प्रति बोरा 37 किलो सूखत को मान्य करा दिया गया। जबकि वास्तविक रूप से इतना नहीं है। समिति से धान जब संग्रहण केंद्र पहुंचा तब प्रबंधकों से भी कमी की भरपाई की गई थी। धान के खेल में ऊपर से लेकर नीचे तक सारे विभाग जमकर मलाई कूट रहे हैं। इसमें मार्कफेड ने जो खेल खेला है, उससे लाखों का वारा-न्यारा हो गया। जानबूझकर इतनी ज्यादा सूखत मान्य करा ली गई, जितनी हो नहीं सकती। रायगढ़ जिले में खरसिया और लोहरसिंह संग्रहण केंद्रों में करीब 9.30 लाख क्विंटल धान जारी किया गया। धर्मकांटे से वजन के बाद धान पहुंचा तो समिति प्रबंधकों से कमी वसूली गई। जितना भी धान कम था, उसके बदले राशि भी ले ली गई। इसके बाद नीलामी हुई। मिलर्स को धान जारी करते समय वजन का पेंच फंसा तो डीएमओ और खाद्य विभाग ने मिलकर नया रास्ता निकाला। किसी तरह से कलेक्टर को कन्वेंस कर लिया गया और एमडी मार्कफेड को पत्र जारी कर दिया गया। सामान्यत: सूखत आने पर लिखित में इस तरह पत्राचार नहीं किया जाता, लेकिन कलेक्टर को बताया गया कि भंडारित धान पुराने और नए बारदाने होने के कारण औसत वजन 38 किलो से कम होने पर धान का निराकरण नहीं हो पा रहा है। इसलिए संग्रहण केंद्र मॉड्यूल में 37 किलो औसत वजन माना जाए। प्रति बोरा 40 किलो धान का वजन होता है। दोनों संग्रहण केंद्रों से 37 किलो मान्य कर लिया गया। मतलब प्रति बोरा 3 किलो की कमी मान्य कर ली गई जो नए खेल की ओर इशारा कर रहा है। इस खेल में कई परतें हैं जिनको धीरे-धीरे उधेड़ा जाएगा।
ज्यादा सूखत मान्य मतलब गोलमाल
जब धान स्वीकार किया गया था तो समिति स्तर पर जीरो सूखत था। समिति को 100 ग्राम सूखत भी मान्य नहीं है। मतलब पूरा धान लिया गया। बाद में संग्रहण केंद्र स्तर पर प्रति बोरा 37 किलो वजन माना गया। इस हिसाब से प्रति स्टेक 90 क्विंटल की सूखत हो रही है जो वास्तव में है नहीं वर्तमान में स्टेक उठते जा रहे हैं। इतना सूखत मान्य कराने के पीछे मार्कफेड का कोई बड़ा गेमप्लान है।
बिना प्राइस मैच किए मिला नान का डीओ
अतिशेष धान की नीलामी नीति को कुछ मिलर्स ने बायपास करके अतिरिक्त लाभ उठाया है। मार्कफेड की कार्यशैली सवालों के घेरे में है। नीलामी के दौरान प्राइस मैच करवाने के बाद सिक्योरिटी डिपॉजिट देना होता है। जितना धान खरीदा जाता है उतना नान का कोटा मिलता है, लेकिन प्राइस मैच किए बिना ही कुछ मिलर्स को नान का कोटा मिला है। नियम विरुद्ध धान दे दिया गया।
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